वैक्सीन नीति पर केंद्र सरकार दृढ़, सुप्रीम कोर्ट में कहा- इसमें न्यायिक हस्तक्षेप की जगह सीमित

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सुप्रीम कोर्ट

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जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस एस रवींद्र भट्ट की पीठ ने रविवार (2 मई) रात अपलोड किए गए 64 पन्नों के अपने आदेश में कहा, ‘मौजूदा नीति की संवैधानिकता पर हम कोई निर्णायक फैसला नहीं दे रहे हैं लेकिन जिस तरह से वर्तमान नीति तैयार की गई है उससे संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जनस्वास्थ्य के अधिकार के लिए हानिकारक परिणाम होंगे.’

नई दिल्ली. केंद्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में कहा है कि देश में वैक्सीनेशन (Vaccination In India) के लिए उसकी रणनीति सभी को समान रूप से टीका वितरित करने की है. सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने कहा कि महामारी के इस समय में इन मामलों में ‘न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा’ सीमित है.  रविवार रात सौंपे गए हलफनामे में केंद्र ने कहा कि राज्यों द्वारा अनुरोध किए जाने के बाद 18 वर्ष से 44 वर्ष के बीच टीकाकरण अभियान को मंजूरी दी गई थी. केंद्र ने टीका निर्माताओं को समान कीमतों पर राज्यों को टीके की आपूर्ति के लिए राजी किया. हलफनामे में कहा गया है- यह नीति ‘न्यायसंगत, भेदभाव रहित और दो आयु समूहों (45 से अधिक और नीचे के लोगों)  पर आधारित है.’ केंद्र ने कहा- ‘इस नीति में न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप की जरूरत नहीं  है क्योंकि महामारी के दौरान कार्यपालिका इससे निपट रही है. उसके  विस्तृत दायरे हैं.’ पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र को उसकी COVID-19 वैक्सीन मूल्य निर्धारण नीति को फिर से जारी करने का निर्देश देने के बाद यह हलफनामा दायर किया गया.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
बीते सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने 18-44 आयु समूह के लिए केंद्र को कोविड-19 मूल्य नीति पर फिर से गौर करने का निर्देश देते हुए कहा है कि पहली नजर में यह जीवन के अधिकार के विपरीत है और यह संविधान के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकार के विपरीत भी नजर आती है. जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस एस रवींद्र भट्ट की पीठ ने संबंधित टीका नीति पर आपत्ति जताई थी जिसमें 18-44 आयु समूह के टीकाकरण के लिए राज्यों और निजी अस्पतालों को 50 प्रतिशत टीके खरीदने होंगे.पीठ ने कहा कि राज्यों को सीधे विनिर्माताओं से बात करने के लिए छोड़ने से अफरातफरी और अनिश्चितता उत्पन्न होगी. इसने कहा कि आज की तारीख में विनिर्माताओं ने दो भिन्न मूल्यों का सुझाव दिया है. इसके तहत, केंद्र के लिए कम मूल्य और राज्य सरकारों को टीके की खरीद पर अधिक मूल्य चुकाना होगा. शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकारों को प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने और नए निर्माताओं को आकर्षित करने के नाम पर विनिर्माताओं के साथ बातचीत के लिए बाध्य करने से टीकाकरण वाले 18 से 44 साल के आयु समूह के लोगों के लिए गंभीर परिणाम होंगे.

पीठ ने कहा कि आबादी के अन्य समूहों की तरह इस आयु वर्ग में भी वे लोग भी शामिल हैं जो बहुजन हैं या दलित और हाशिए के समूहों से संबंधित हैं. हो सकता है कि उनके पास भुगतान करने की क्षमता न हो. पीठ ने कहा, ‘आवश्यक टीके उनके लिए उपलब्ध होंगे या नहीं, यह प्रत्येक राज्य सरकार के निर्णय पर टिका होगा. राज्य सरकार का निर्णय उसकी आर्थिक स्थित तथा इस बात पर निर्भर होगा कि यह टीका मुफ्त में उपलब्ध कराया जाना चाहिए या नहीं और सब्सिडी दी जानी चाहिए या नहीं और दी जाए तो किस सीमा तक. इससे देश में असमानता पैदा होगी. नागरिकों का किया जा रहा टीकाकरण जनता की भलाई के लिए है.’




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